बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि वैधानिक आयोगों को ‘सिफारिश’ शब्द से अदालत की शक्तियां नहीं मिल जातीं। 21 लाख रुपये के हार्वेस्टर विवाद में कोर्ट ने पिछड़ा वर्ग आयोग की कार्रवाई को अधिकार क्षेत्र से बाहर माना और एकलपीठ के आदेश को बरकरार रखा।

क्या है पूरा मामला?

मामला दुष्यंत प्रकाश नाग बनाम छत्तीसगढ़ राज्य से जुड़ा है। दुष्यंत ने हार्वेस्टर खरीदने के लिए 31 जुलाई 2020 को 30 हजार रुपये एडवांस दिए, फिर 9 सितंबर 2020 को 20.70 लाख रुपये की शेष राशि चुका दी। कुल भुगतान 21 लाख रुपये हुआ।

आरोप है कि पूरा पैसा लेने के बाद भी डीलर कमला मोटर्स ने हार्वेस्टर नहीं दिया। इसके बाद मामला राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग पहुंचा।

आयोग ने क्या किया था ?

आयोग ने मामले में हस्तक्षेप करते हुए कमला मोटर्स के संचालक से मुआवजा राशि वसूलने की सिफारिश कर दी। यानी दो निजी पक्षों के बीच पैसे की देनदारी तय करने लगा।

कमला मोटर्स ने इसी कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी। एकलपीठ ने आयोग की कार्यवाही को निरस्त कर दिया था।

युगलपीठ का बड़ा फैसला

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की युगलपीठ ने अपील खारिज करते हुए कहा – पिछड़ा वर्ग आयोग की भूमिका मूल रूप से सलाहकारी है। जांच के लिए उसे सिविल कोर्ट जैसी कुछ शक्तियां दी गई हैं, लेकिन इससे वह सिविल कोर्ट नहीं बन जाता और निजी पक्षों के बीच अधिकार-देनदारी तय नहीं कर सकता।

सुप्रीम कोर्ट का हवाला

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख किया, जिसमें स्पष्ट है कि आयोग को जांच शक्तियां देने मात्र से उसे अदालत का दर्जा नहीं मिल जाता। सिफारिश को आदेश मानकर लागू नहीं किया जा सकता।

FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

Q1. क्या फैसला आया है?
A: आयोग निजी देनदारी तय नहीं कर सकता, एकलपीठ का आदेश बरकरार।

Q2. मामला किस चीज का था?
A: 21 लाख के हार्वेस्टर का भुगतान लेकर मशीन नहीं देने का।

Q3. पैसे कब दिए गए थे?
A: 31 जुलाई 2020 को 30 हजार एडवांस और 9 सितंबर 2020 को 20.70 लाख।

Q4. आयोग ने क्या किया था?
A: कमला मोटर्स से मुआवजा वसूलने की सिफारिश की थी।

Q5. कोर्ट ने क्या सिद्धांत दिया?
A: सिफारिश को अदालत की शक्ति नहीं मिलती, आयोग सिविल कोर्ट नहीं बनता।

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