बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने उत्तराधिकार प्रमाणपत्र से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मृतक की मां को उत्तराधिकार आवेदन में पक्षकार बनाना जरूरी है और मां को पक्षकार बनाए बिना लिया गया आदेश वैध नहीं माना जा सकता।
क्या है पूरा मामला?
लवन, बलौदाबाजार-भाटापारा निवासी पिंकी रत्नाकर ने अपने दिवंगत पति विकास रत्नाकर के संबंध में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 372 के तहत उत्तराधिकार प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किया था। इस पर ट्रायल कोर्ट ने उनके पक्ष में आदेश दे दिया था।
मां है प्रथम श्रेणी की वारिस
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान पाया गया कि लैनबाई मृतक विकास रत्नाकर की मां हैं, जिसे याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने भी स्वीकार किया। न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी ने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 8 की अनुसूची के अनुसार मृतक की मां प्रथम श्रेणी की कानूनी वारिस होती है, इसलिए उसे आवेदन में आवश्यक पक्षकार बनाया जाना चाहिए था।
पत्नी की अपील खारिज
अदालत ने कहा कि इस तथ्य को छिपाकर और मां को पक्षकार बनाए बिना ट्रायल कोर्ट से अपने पक्ष में आदेश प्राप्त करना उचित प्रक्रिया नहीं है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पिंकी रत्नाकर की अपील को प्रवेश स्तर पर ही खारिज कर दिया।
फिर से होगी सुनवाई
हाईकोर्ट ने प्रथम जिला न्यायाधीश के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें ट्रायल कोर्ट का फैसला निरस्त कर मामले को नए सिरे से सुनने के निर्देश दिए गए थे। अब लैनबाई को पक्षकार बनाकर उन्हें अपना पक्ष और साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाएगा।
FAQ: हाई कोर्ट का अहम् फैसला
सवाल 1. हाईकोर्ट ने क्या फैसला दिया?
जवाब: कोर्ट ने कहा कि मां प्रथम श्रेणी की वारिस है, इसलिए उत्तराधिकार आवेदन में उसे पक्षकार बनाना जरूरी है।
सवाल 2. मामला किससे जुड़ा है?
जवाब: बलौदाबाजार की पिंकी रत्नाकर ने पति विकास रत्नाकर के लिए उत्तराधिकार प्रमाणपत्र का आवेदन किया था।
सवाल 3. पत्नी की अपील क्यों खारिज हुई?
जवाब: क्योंकि उन्होंने मां लैनबाई को पक्षकार बनाए बिना आदेश ले लिया था, जो उचित प्रक्रिया नहीं है।
सवाल 4. अब आगे क्या होगा?
जवाब: ट्रायल कोर्ट का आदेश निरस्त हो गया है, अब मां को पक्षकार बनाकर नए सिरे से सुनवाई होगी।

