बिलासपुर। हाईकोर्ट ने मासूम सौतेली बेटी की अस्मत लूटने के आरोपी पिता की सजा के खिलाफ पेश अपील को खारिज करते हुए अपने आदेश में कहा कि भारतीय समाज में, बिना किसी सबूत के यौन उत्पीड़न की शिकार महिला की गवाही पर कार्रवाई करने से इनकार करना, आमतौर पर जले पर नमक छिड़कने जैसा है। भारत के पारंपरिक समाज में कोई लड़की या महिला, यहां तक कि बहुत हिचकिचाएगी भी। यह मान लें कि कोई भी ऐसी घटना जो उसकी पवित्रता पर सवाल उठा सकती है, कभी हुई थी। उसे समाज से अलग-थलग किए जाने का खतरा होगा और जब इन वजहों से जुर्म सामने आता है, तो यह पक्का यकीन होता है कि आरोप असली है, मनगढ़ंत नहीं।
कोर्ट ने कहा कि जैसे कोई गवाह जिसे ऐसी चोट लगी हो, जो दिखाई न दे या खुद से लगी हुई न मानी जाए, वह सबसे अच्छा गवाह होता है क्योंकि उसके असली अपराधी को बरी करने की संभावना सबसे कम होती है, वैसे ही सेक्स अपराध की शिकार महिला के सबूत को बहुत ज़्यादा अहमियत दी जाती है, भले ही कोई सबूत न हो। जिस महिला या लड़की का रेप हुआ हो, वह साथी नहीं है। रेप के मामले में दोषी ठहराए जाने के लिए सबूत का होना ज़रूरी नहीं है। नाबालिग पीड़ित की गवाही, अगर पक्की, एक जैसी और भरोसेमंद पाई जाती है, तो बिना किसी अलग से पुष्टि किए उसे दोषी ठहराने के लिए काफी है। जहां सबूत क्रॉस-एग्जामिनेशन में टिकते हैं और भरोसा दिलाते हैं, उन्हें पूरी तरह से सबूत के तौर पर महत्व दिया जाना चाहिए।
जानें क्या है मामला
मामला यह है सरगुजा निवासी चौथी कक्षा की पीड़िता के पिता की मौत के बाद उसकी मां ने आरोपी से दूसरी शादी की। शादी के बाद पीड़िता, अपने भाई एवं मां के साथ 15 दिन खुशी-खुशी रहें। इसके बाद मां जब काम में गई तो आरोपी उसे बुलाया एवं उसके साथ अप्राकृतिक कृत्य करने के साथ उससे संबंध बनाया। पीड़िता दर्द से कराहती रही किन्तु आरोपी नहीं रूका। यही नहीं आरोपी उसके साथ दो वर्ष तक ऐसा कृत्य करता रहा। पीड़िता ने इस बारे में बताया, और उसने कहा कि जब वह वापस आएगा तो वह उसे बताएगी। उसके बाद, जब वह आया तो उसकी माँ चुप रही। दो-तीन दिन तक उसने उसे बताया, लेकिन उसने कुछ नहीं किया।
पीड़िता के मुताबिक आरोपी उसे घर से बाहर नहीं जाने देता था ताकि वह किसी को न बताए और वह उससे रोज़ झाड़ू, पोछा और बर्तन धुलवाता था। जब वह उसे स्कूल भेजता था, तब भी वह उसे किसी से मिलने नहीं देता था और मैडम को भी किसी से न मिलने की हिदायत दे रखी थी। छुट्टियों के बाद, उसने उनसे कहा था कि उसे बाहर न जाने दें, जब वे आएंगी तो उसे ले जाएंगी। पीड़िता ने कहा है कि जब वह स्कूल से लौटती थी, तो वह उससे ड्रेस बदलवाता था और उसे बुरी तरह पीटता था। अगर उसे इंग्लिश पढ़नी नहीं आती थी, तो वह उसे बांस के डंडे से पीटता था। दो वर्ष की इस क्रूरता को लिखा नहीं जा सकता बच्ची हर दिन उस नरक में जी रही थी। माँ भी उसकी पीड़ा को अनदेखी कर रही थी।
चाइल्ड हेल्प लाइन की पहल पर मामला उजागर
चाइल्ड हेल्प लाइन ने की सहायता सरगुजा चाइल्ड लाइन के सदस्य एक दिन स्कूल आए और बच्चों से कहा कि यदि आप लोगों के साथ घर या बाहर में कोई कुछ कहता है, गलत हरकत करता है, आप लोग मुझे बता सकतें हैं। हम लोग आप की सहायता करेंगे। इसके बाद पीड़िता ने अपनी सहेली को बताई, उसकी सहेली ने शिक्षिका को फिर दिसंबर 2015 में मामला उजागर हुआ। स्कूल के शिक्षिका एवं चाइल्ड हेल्प लाइन के माध्यम से रिपोर्ट लिखाई गई। पुलिस ने अपराध दर्ज कर आरोपी को जेल दाखिल किया
न्यायालय से हुई है आजीवन कारावास की सजा
विशेष न्यायाधीश पाक्सो ने सुनवाई उपरांत आरोपी को धारा 377 में 108 वर्ष का कठोर कारावास, 500 रू अर्थदंड एवं पाक्सो एक्ट की धारा 5 एवं 6 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। आरोपी ने इस सजा के खिलाफ अपील पेश की थी। हाईकोर्ट ने अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के सजा को यथावत रखा है।

