नई दिल्ली। एक साइबर अपराध मामले की सुनवाई के दौरान, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि हो सकता है कि किसी हत्यारे को रिहा करके सुधारा जा सके, लेकिन साइबर अपराधियों को बिल्कुल भी नहीं बख्शा जाना चाहिए।

अदालत के सामने मौजूद आरोपी का ज़िक्र करते हुए—जिसका कथित तौर पर साइबर धोखाधड़ी का इतिहास रहा है—CJI ने कहा कि उसके जैसे साइबर अपराधी को एक अलग कोठरी में रखा जाना चाहिए, जहां उसे किसी भी तरह के मोबाइल फ़ोन आदि के इस्तेमाल की कोई गुंजाइश न हो।

CJI ने टिप्पणी की,

“इससे निपटने का यही एकमात्र तरीका है।”

CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ सूरज श्रीवास्तव द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाले मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें IPC की धारा 420/120B और IT अधिनियम की धारा 66D के तहत दर्ज एक मामले में उसकी ज़मानत याचिका खारिज कर दी गई।

कहा जाता है कि श्रीवास्तव 12.05.2025 से जेल में है और उसके खिलाफ पहले से ही 3 आपराधिक मामले दर्ज हैं। आरोपों के अनुसार, उसने इस मामले में शिकायतकर्ता को पार्ट-टाइम नौकरी दिलाने के बहाने 6,55,700 रुपये की धोखाधड़ी की। कथित तौर पर उसने 5 खाते खोले, जिनमें पैसे ट्रांसफर किए गए और कुछ UPI लेन-देन भी उससे जुड़े हुए पाए गए।

विवादित आदेश के ज़रिए हाईकोर्ट ने श्रीवास्तव को ज़मानत देने से इनकार किया। न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि डिजिटल तकनीक में हो रही प्रगति के साथ-साथ देश में साइबर अपराधों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। न्यायालय ने यह भी कहा कि साइबर अपराध ‘खामोश वायरस’ की तरह हैं, जो चुपके से समाज को नुकसान पहुंचा रहे हैं और समाज को केवल आर्थिक नुकसान से कहीं ज़्यादा बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है।

इस आदेश से व्यथित होकर श्रीवास्तव ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। यह याचिका एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (AoR) गौरव खन्ना के माध्यम से दायर की गई।

इसी से जुड़ी एक अन्य खबर में जस्टिस सूर्यकांत (जो अब CJI हैं) की अध्यक्षता वाली पीठ ने पिछले साल “डिजिटल गिरफ़्तारी घोटालों” (Digital Arrest Scams) से जुड़े एक मामले का स्वतः संज्ञान लिया था। यह कार्रवाई हरियाणा के अंबाला की रहने वाली 73 वर्षीय एक महिला की शिकायत के बाद की गई। महिला ने आरोप लगाया कि कुछ जालसाज़ों ने सुप्रीम कोर्ट के जाली आदेशों का इस्तेमाल करके उसे तथाकथित “डिजिटल गिरफ़्तारी” के नाम पर बंधक बना लिया और उससे 1 करोड़ रुपये से भी ज़्यादा की रकम ऐंठ ली।

स्वतः संज्ञान मामले में न्यायालय के आदेश के अनुपालन में गृह मंत्रालय ने “डिजिटल गिरफ्तारियों” से संबंधित सभी पहलुओं की व्यापक जांच करने के लिए एक उच्च-स्तरीय अंतर-विभागीय समिति का गठन किया।

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