नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ में आदिवासी ईसाइयों के मृतकों के शवों को जबरन कब्र से निकालकर गांव से बाहर स्थानांतरित किए जाने की कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगा दी। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की खंडपीठ ने जनहित याचिका पर नोटिस जारी करते हुए आदेश दिया कि “इस बीच दफनाए गए शवों को आगे नहीं निकाला जाएगा।” याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंसाल्विस ने आरोप लगाया कि राज्य प्रशासन शवों को हटाने की कार्रवाई का समर्थन कर रहा है, जिसके बाद अदालत ने यह अंतरिम राहत दी। मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद निर्धारित की गई है।
अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका में कहा गया है कि छत्तीसगढ़ में आदिवासी ईसाइयों को अपने गांव की सीमा के भीतर मृतकों को दफनाने से जबरन रोका जा रहा है, जबकि अन्य समुदायों को ऐसा करने की अनुमति है। आरोप है कि याचिकाकर्ताओं के परिजनों के शव उनकी जानकारी के बिना कब्र से निकालकर गांव से दूर स्थानों पर ले जाने का प्रयास किया गया। याचिका में यह भी कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के रमेश बघेल बनाम छत्तीसगढ़ राज्य मामले में आए विभाजित फैसले का उपयोग पुलिस द्वारा ईसाइयों को अपने गांव में दफनाने से रोकने के लिए किया जा रहा है, भले ही वहां कोई स्थानीय विवाद न हो। उस मामले में एक न्यायाधीश ने निजी भूमि पर दफन की अनुमति दी थी, जबकि दूसरे न्यायाधीश ने केवल निर्धारित ईसाई कब्रिस्तान में दफनाने की बात कही थी।
इस पृष्ठभूमि में याचिका में मांग की गई है कि धर्म, जाति या समुदाय की परवाह किए बिना सभी लोगों को अपने निवास वाले गांव में मृतकों को दफनाने का अधिकार घोषित किया जाए। साथ ही राज्य के सभी ग्राम पंचायतों को प्रत्येक गांव में सभी समुदायों के लिए कब्रिस्तान हेतु भूमि चिन्हित करने और पारंपरिक दफन प्रथाओं में हस्तक्षेप न करने के निर्देश देने की मांग भी की गई है।
उल्लेखनीय है कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका भी खारिज कर दी थी, जिसमें ग्राम सभा द्वारा गांव के प्रवेश द्वार पर ईसाई पादरियों और धर्मांतरित ईसाइयों के प्रवेश पर रोक संबंधी बोर्ड लगाए जाने की कार्रवाई को सही ठहराया गया था।
याचिका में धर्मनिरपेक्षता और भाईचारे की भावना को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से एक ही गांव के भीतर सभी समुदायों के लिए साझा कब्रिस्तान विकसित करने की भी पैरवी की गई है। इसमें कहा गया है कि गांव के सार्वजनिक कब्रिस्तान में स्थान न देना संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि राज्य तंत्र मौलिक अधिकारों की रक्षा करने के बजाय उन सांप्रदायिक तत्वों के अवैध कृत्यों को संरक्षण दे रहा है, जो कब्रों से शव निकालते हैं और शोकाकुल परिवारों को भयभीत करते हैं।

